यदि कहानी का भाग2 नहीं पड़ा तब पढ़िए अभी। शुरू से शुरू करना हो तो पढ़िए भाग1

 कुछ देर तो गले लग कर रोया मैं। वह समझती थी एक बच्चे को कैसे शांत किया जाएगा। जब मेरी सिसकियां कम हुई तो उन्होंने पूछा: क्या हुआ? यहां कैसे आए? ऐसी हालत कैसे हुई तुम्हारी?

वो वो वो, मेरे पीछे हैं…. मुझे पकड़ लेंगे… डरी हुई आवाज से मैंने हकलाते हुए कहा।

कौन लोग? वो पूछती है।

 मुझे कुछ नहीं पता। मुझे छुपा लो बस। उन्हें पता ना चले।

 वो मुझे अपने घर के भीतर ले जाती है। खुद ना खा के मुझे खाना खिलाती है पहले। पूरे एक दिन से कुछ नहीं खाया था मैंने। घी शक्कर और रोटी के सामने किसी होटल के खाने का स्वाद भी कम लग रहा था।

 भूख क्या होती है आज जाना। जिंदगी क्या होती है ये तो पिछली रात खुद ही जिंदगी ने दिखा दिया था।

अभी समस्या टली नहीं थी वह लोग मेरा पीछा करते वहां भी पहुंच गए। इन दरिंदों से तो वह डरावनी जानवर भी डरते हैं। नक्सली यही तो करते हैं, चंद पैसों के लिए हमारे वनों को ही बर्बाद कर रहे हैं। मैया ने मुझे जल्दी से छत में छुपा दिया और कहा यहां छुप जाओ।

वह लोग पूछते हैं कि किसी लड़के को देखा वह घर से शाम को भाग गया है। उन्होंने मना कर दिया ऐसा मुझे लगा लेकिन उन्हें लगा शायद ये लोग सच कह रहे हो। हो सकता है मैं घर से भाग गया हूं। ऐसा सोचकर उन्होंने इशारे से बता दिया कि मैं छत में छुपा हूं। यह सब मैं एक छेद से देख रहा था। जब बुरा हो रहा होता है तो बुरे से बुरा क्या हो सकता है वह भी हो जाता है। छत पर एक रास्ता था बाहर जाने का मैंने वही पकड़ लिया। इससे पहले कि वह मुझे देख पाते मैं वहां से भाग निकला।

 फिर से उस सड़क पर मैं था भागते भागते मैं एक और सड़क पर जा पहुंचा कुछ गाड़ियां दिखाई दे रही है। सड़क पर एक बसाई मैं उस पर बैठ गया। जल्दबाजी में बस कहां जा रही है बोर्ड में पढ़ भी नहीं पाया।

 कंडक्टर पूछता है: कहां जाना है?

 बस कहां जा रही है? मैं पूछता हूं।

 लड़के पता नहीं कुछ बिना पढ़े बैठा है? कंडक्टर बोलता है।

   अब कुछ गड़बड़ ना हो इसलिए सोच समझकर मैंने कहा: मुझे कुछ सामान लेना है जो यहां नहीं मिलेगा सबसे नजदीक शहर कौन सा है?

उसने कहा अमूक शहर।

 मैंने कहा हां वही का टिकट दे दो। बस वो लोग पीछे ना जाए ऐसी प्रार्थना कर रहा था। बस रूकती है और मैं उतर कर पुलिस थाना ढूंढता हूं। दूर पुलिस थाने का बोर्ड दिखता है। अब मैं सुरक्षित था। मैंने पुलिस अधिकारी को सब बताया। उन्होंने मेरे पिताजी को फोन किया। घरवाले मेरे गुमशुदा होने की रिपोर्ट ही लिखवाने जा रहे थे। 

 पुलिस अपने काम में लग गई। गुंडों को पकड़ा गया। थोड़ी देर में मेरा पूरा परिवार वहां आ गया। माता-पिता, दादी, बड़ीमां बड़ेपापा, चाचा चाची, मेरे भाई-बहन। मैं खूब रोया। उम्मीद छोड़ चुका था उन सब को दोबारा देखने की। बस फिर मैं घर आ गया। लेकिन डर रहता है अभी भी कहीं कोई रात फिर से ऐसी भयानक रात ना हो जाए।

 तो कैसी लगी आपको यह कहानी बताइएगा जरूर। ये मेरी कल्पना है इसका वास्तविकता से कोई संबंध तो है क्योंकि जो समस्या मैंने कहानी में बताई वह सत्य है। नक्सलवाद है। मासूम जंगली जानवरों को बेवजह पैसों के लिए मारा जाता है और लड़के और लड़कियां दोनों ही सुरक्षित नहीं है। सावधान रहें सतर्क रहें।

(PS: this is not a script of Savdhaan India, Just Kidding)

 

Pic Credits: https://pin.it/117dlKn