जब से उनसे मुहब्बत हो गई है,
यह फिज़ा नई नई सी हो गई है.

गोरे रुख़सार पर सियह ज़ुल्फें,
कड़कती धूप में रात हो गई है.

उम्मीदों, जुस्तुजूों से जुदा होकर,
आसान राह-ए-मंजिल हो गई है.

किससे गिला रखें, क्यों रखें,
जब क़िस्मत ही बाग़ी हो गई है.

दिल में ख़लिश है ना जिस्म में तपिश,
यक़ीनन जिंदगी की शाम हो गई है.

सियह : काली.

~ संजय गार्गीश ~