कहीं जिंदगी पीपल की ठंडी छांव है, कहीं जिंदगी कड़कड़ाती हुई धूप है.

कहीं जिंदगी असीम खुशियाँ प्रदान करती है तो कहीं जिंदगी तिश्नगी देती है.

कहीं जिंदगी एक मधुर गीत है, कहीं अज्ञात गुनाहों की कठोर सज़ा देती है.

कहीं जिंदगी बेहिसाब नेमतें बख़्शती है तो कहीं जिंदगी सब कुछ छीन लेती है.

अनगिनत मुखौटे पहने रहती है जिंदगी.

कोई कितनी भी कोशिश कर ले, जिंदगी का मुक्कमल इल्म नामुमकिन है.
इंसान की समझ से परे है जिंदगी!

मगर इंसान बेबस है, मजबूर है. उसे तो हर परिस्थिति में कठपुतली की तरह जिंदगी के इशारों पर नाचना है, उसका हुक्म बजाना है.

हालात चाहे जैसे भी हो, इंसान को तो चलते जाना है, बस चलते ही जाना है.

अपनी नई गज़ल पेश कर रहा हूँ. उम्मीद है आप को पसंद आएगी :

✴️ जिंदगी का यही फ़साना है ✴️

ज़िंदगी का यही फ़साना है,
कुछ खोना कुछ पाना है.

चारों तरफ़ वीराना सही
चलते मगर फिर भी जाना है.

मौत तो महज़ एक बहाना है,
वापस घर भी तो जाना है.

ज़मीरों को अपने बचा कर रखिये,
बदला बदला ये ज़माना है.

अंदाज़ नये, रस्म-रिवाज़ नये,
यह दीवाना ही बस पुराना है.

…जिंदगी का यही फ़साना है,
कुछ खोना कुछ पाना है.

~ संजय गार्गीश ~