भारतीय पंचांग के अनुसार छह ऋतुएं हैं, उन में से एक है बसंत ऋतु.

बसंत मेरी पसंदीदा ॠतु है. इसे ऋतुराज भी कहा जाता है.

२६ जनवरी को बसंत पंचमी है यानि बसंत ऋतु की आमद.

बसंत ऋतु की आमद से क़ुदरत अपनी मुक़म्मल जवानी में आ जाती है.
इंसान, जानवर, परिंदे हर्षोल्लास से भर जाते हैं.

भारत में इस रोज़ विद्या की देवी माॅं सरस्वती जी की बंदगी भी की जाती है.

यदि आप अपनी मोहब्बत का इज़हार करना चाहते हैं, तो शायद बसंत ऋतु से बेहतर वक़्त कोई नहीं.

इस मौके पर मैनें नज़्म लिखीं हैं, पेश कर रहा हूँ :

हर चेहरा ख़ुशनुमा है, हर ज़र्रा ख़ुशगवार है,
हर गोशा गुलिस्ताँ है, हर तरफ़ बहार है,

मौसम आशिक़ाना है, फ़िज़ाओं में ख़ुमार है,
भँवरों की गुंजन का फ़ूलों को इंतज़ार है.

सब्ज़ सारे मैदान है, तितलियों की भरमार है,
नीले आसमाॅं में परिंदों की उड़ती डार है.

बाद-ए-बहार आई है घावों पे मरहम रखने को,
बाद-ए-बहार आई है जीवन में रंग भरने को,
मुझको पूरा यक़ीन है, मुझको ऐतबार है.

गोशा : कोना, गुलिस्ताँ : फुलवारी, ख़ुशनुमा : सुंदर, खुशगवार : मन को भाने वाला, ख़ुमार : नशा, सब्ज़ : हरे भरे, बाद-ए- बहार : बसंत ऋतु की सुगंधित और ठंडी हवा.

~ संजय गार्गीश ~