“तुम्हें याद है, जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर स्वयं का अग्नि दाह किया था। उस समय भय से तुम ही मेरे पास यह समाचार लेकर आए थे। फिर मैंने क्या किया था?”

“उस समय आपने यह दुःखद समाचार सुन कर अपनी समाधि में से उठ कर क्रोध से अपनी एक जटा को तोड़ कर धरती पर पटका था तो आप ही का विनाशकारी स्वरूप वीरभद्र उत्पन्न हुआ था और दूसरी जटा को पटकने से देवी भद्रकाली उत्पन्न हुई थी। और विभित्स कोहराम के बाद में क्रोधित वीरभद्र ने खड्ग से दक्ष का सिर, धड़ से अलग कर दिया था। जिसे बाद में आपने बकरे का सिर लगा कर जीवित किया था।” नंदी उतने ही आवेग में बोला जैसे वो घटना कल ही हुई हो

“और एक बार जब मैं और देवी, एक दूसरे के नेत्र बंद करके भिन्न भिन्न प्रश्न करते हुए खेल रहे थे तो जब देवी ने मेरे नेत्र व्यंग से बंद कर दिए थे तो क्या हुआ था?”

 

“महादेव, तब अंधकासुर की उत्पत्ति हुई थी। जिसका संहार आपको स्वयं करना पड़ा था।” नंदी ने हाथ जोड़ कर कहा, “लेकिन माँ जगदंबा का नया अवतार बिना किसी इच्छा या प्रार्थना के कैसे?”

“मुझ में और देवी पार्वती के अस्तित्व में कुछ भी अंतर नही है। अगर क्रोध में मेरी एक जटा पृथ्वी पर गिरने से या व्यंग में नेत्र बंद होने से मेरे समान किसी बलशाली की उत्पत्ति हो सकती है तो अकस्मात् देवी के कुछ केश गिरने से, पूजा का कुम कुम गिरने से यह भी उतना ही स्वाभाविक और शक्तिशाली है। तभी तो अर्धनारिश्वर का स्वरूप का इतना महत्व है।”

“यह भी स्मरण होगा, जब मैं देवी सती की मृतक देह को उठा कर ब्रह्मांड में विक्षिप्त होकर यहाँ वहाँ विचरण कर रहा था, तो श्री हरि ने अपने चक्र से अज्ञात रूप से देवी के शरीर के अंग अलग अलग कर दिए थे और वह अंग जहाँ जहाँ भी गिरे, वहाँ देवी के सिद्ध पीठ स्थापित हो गए। जब कि देवी सती उस समय मानवीय स्वरूप में थी। अब तो देवी साक्षात् माँ जगदंबा है।”

“लेकिन महादेव, शंख ने तो सब जल प्रवाह कर दिया था, उसके बाद भी ऐसा क्यों हुआ?”

“तभी तो नंदी, यह सेवा तुम्हें सौंपी गयी थी। शंख ने सब सामग्री एक साथ जल में फेंकी थी, ना कि जल प्रवाह की थी। विशिष्ट प्रक्रिया में सारी चीजों को एक एक करके जल प्रवाह करना था और उसके मंत्रों में यह प्रार्थना थी कि हे प्रकृति, यह मात्र एक भूल थी, कृपया क्षमा करें और आप अपने स्थान पर ही विराजित रहें, अवतरण ना लें। जल में सारी सामग्री फेंकने के बाद यह सभी लोग मानसरोवर स्थल की ओर चल पड़े। शंख और अन्य गणों ने अभिषेक स्थल पर पहुँचने की जल्दबाज़ी में यह भी नही देखा कि क्या सारी सामग्री ढंग से बह गयी है या नही। जब कि सारी सामग्री गिरिगंगा के तट से साथ लग कर वही ठहर गयी और धीरे धीरे दिव्य सामग्री देवी वाम केशी के स्वरूप में परिवर्तित हो गयी। क्या तुम ने एक बात ध्यान से देखी कि देवी वाम केशी के केश कितने सुंदर है और वह कुम कुम जैसी ही रक्तवर्णा है और शारीरिक वनावट तुम्हारी माँ देवी पार्वती जैसी ही है।”

यह सुन कर नंदी की आँखें बहुत बड़ी बड़ी हो गयी थी।                   

“अगर शंख की जगह तुम होते तो विधि अनुसार सारा कार्य सम्पन्न करके तो आते ही और अंत तक यह भी देख कर आते की क्या कहीं कोई वस्तु तट पर तो नही रह गयी। तभी तो मैं तुम से इतना खिन्न हूँ। क्यों कि यह सेवा बहुत महत्वपूर्ण थी और तुम ने…”

“महादेव, कुछ तो कृपा कीजिए, भगवन। मैं नही चाहता मेरे अपराध का दंड सम्पूर्ण ब्रह्मांड को मिले।”

“इस बार भूलवश ही कुछ ऐसा हुआ है। देवी वाम केशी, देवी काली जैसे उग्र और मृत्यु स्वरूपा नही है लेकिन देवी पार्वती की तरह सरल और करुणामय भी नही है। बल्कि थोड़ी सी उद्दंड होंगी। किसी भी देवता या देवी का अवतरण किन परिस्तिथियों में हो रहा है आदि का उसके अवतरण में बहुत ही प्रभाव होता है। और दो तरह के अवतरण होते है-नित्य अवतरण और निमित्त अवतरण। नित्य अवतरण में समयानुसार जन्म लिया जाता है, जीवन की सारी लीला होती है और लीला पूरी होने के बाद देव या देवी वैसे मृत्यु को प्राप्त होते है। निमित्त अवतरण वाले देव या देवी को जन्म लेने की आवश्यकता नही होती, उनका अवतरण किसी विशेष लक्ष्य के कारण होता है और बहुत शीघ्रता से अपना कार्य सम्पूर्ण करके उन्हें अपने स्रोत में विलीन हो जाना होता है जैसे कि देवी काली, देवी भद्र काली और वीरभद्र आदि अपना (निमित्त) उद्देश्य पूर्ण करके अपने स्रोत में विलीन हो गए। लेकिन देवी जगदंबा से केवल उन्हीं के भिन्न-२ स्वरूप उत्पन्न होंगे, ना कि कभी कोई असुरी शक्ति उत्पन्न होगी और जब कि मेरी लीला से केवल असुर या दैत्य ही पैदा होंगे क्यों कि मैं भूत नाथ भी हुँ। देवी का यह नित्य नही, बल्कि निमित्त अवतार है। इसलिए मुझे देवी वाम केशी के अवतरण की सिद्धि के लिए कोई तो कारण उत्पन्न करना होगा। अपनी लक्ष्य पूर्ति के बाद ही देवी वाम केशी पुनः वापिस जा सकेगीं।”

“महादेव, क्या केवल आपके और माँ जगदंबा के ही निमित्त अवतार हुए है?”

“नही नंदी, समय और दायित्व के अनुसार ही कोई देव अथवा देवी अवतरण लेते है। श्री हरि के भी कुछ अवतार जैसे कि नरसिंह अवतार, मोहिनी अवतार, वराह अवतार, कच्छप अवतार आदि ऐसे ही हुए है जो कि किसी विशेष कारण के निमित्त हुए और लक्ष्य पूर्ति के बाद पुनः अपने स्रोत में समाहित हो गए।”

अब नंदी को समझ आ रहा था कि गिरिगंगा में सब सामग्री विसर्जन के लिए उसका स्वयं जाना कितना ही ज़रूरी था और वो विशिष्ट क्रिया कितनी महत्वपूर्ण थी। अगर उसने वो क्रिया स्वयं की होती तो देवी वाम केशी का यह अवतार नही होता।
“महादेव, मैं वास्तव में ही दंड का अधिकारी हुँ।” ऐसा कह कर नंदी महादेव की ओर केवल भरे हुए नेत्रों से छोटे बालक की भाँति देख रहा था
“नंदी, चिंता मत करो। मैं हुँ ना! दंड तो इसका तुम्हें अवश्य मिलेगा, लेकिन ना के बराबर। तुम इसका बीज प्रकृति के चक्र में डाल चुके हो। और तुम्हारे अवज्ञा कर्म का भुगतान मेरी उपस्तिथि में होना अनिवार्य है। अन्यथा तुम्हारे इस दंड की अवधि बहुत लम्बी हो जाएगी।” महादेव ने बहुत ही प्रेम और करुणा से नंदी के शीश पर अपना हाथ रखते हुए कहा

अभी नंदी और फूट फूट कर महादेव के चरणों में अपना सिर रख कर रोने लगा। उसको ऐसे लग रहा था जैसे महादेव ने उसे भीष्म अग्नि से निकाल कर शीतल जल धारा में बिठा दिया हो। नंदी के लिए इतना ही पर्याप्त था कि महादेव की उपस्तिथि में सब हो रहा था। नंदी ने दंड के बारे में एक बार भी नही सोचा क्यों कि महादेव की पूर्ण छत्रछाया उस पर थी।

इसी को तो गुरु कृपा कहते है। जब सभी ओर से मनुष्य हार जाता है। तभी एक सुगम रास्ता निकलता है और निराशा, आनंद में परिवर्तित हो जाती है। विश्वास, ईश्वर में और भी अधिक दृढ़ हो जाता है और ईश्वर के साथ एक अटूट दिव्य सम्बंध बन जाता है।  

नंदी को महादेव ने शांत करके, कुछ आहार खाने के लिए भेज दिया।

और एकांत में स्वयं को महादेव ने एक गहरी सोच में लम्बी साँस लेते हुए कहा, “कहाँ मैं मंगल अभिषेक के तुरंत बाद, तप और एकांत के लिए कैलाश पर जाना चाहता था और कहाँ अभी पहले देवी की इस लीला को विराम देना होगा, फिर जा पायूँगा।”

To be continued…

           सर्व-मंगल-मांगल्ये शिवे सर्वार्थ-साधिके। 

           शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते ।।

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I offer my infinite pranams to our Almighty on the auspicious occasion of Guru Purnima. What karmas could I have done to deserve the service of Your Kindness’s lotus feet? It’s Your Kindness’s compassion and Grace that I am blessed with your divine service and also a beautiful life free from all worldly worries.

Koti Koti Naman

Charansprash

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